यूँ ही नहीं लेखक को कलम का सिपाही कहा जाता है। लेखक अपनी कहानियों और रचनाओं से दिल में एक छाप छोड़ देते हैं।कभी कभी एक जान आंदोलन का भी रूप ले लेती एक व्यक्ति की विचारधारा। हमारे देश को पहला नोबेल प्राइज एक राइटर और पोएट को मिला है और वो थे रविंद्रनाथ टैगोर| जिनकी कहानियों में महिलाएं डॉक्टर , वकील , हवलदार , अध्यापक हुआ करती थी , ना जाने क्या बात हुई की 1940 -1990 के दौरान कहानियों में महिलाओं का पात्रों में बेचारगी और असहाय दिखाने लगे या लीड एक्टर को लुभाने वाली बना दिया गया | हमें यह बताया गया की सीता जी असहाय महिला थी जिन्होंने अग्निपरीक्षा दी थी लेकिन किसी ने यह नहीं बताया की सीताजी राजा जनक की पुत्री नहीं थी गोद ली हुई पुत्री थी फिरभी उन्हें राजकुमारी जैसा परिवरिश और सम्मान मिला | अंग्रेजों ने गोद लिए गए बच्चों को वारिस मानने से ही मना कर दिया। उस समय कोई कलम का सिपाही होता तो अंग्रेजों को बताता की यह हमारी संस्कृति है की बच्चे को गोद लेकर पूरा अधिकार दें |
हमें यह बताया गया की हम कितने तुच्छ हैं की जातिओं में बटें हुए हैं लेकिन किसी कलम के सिपाही ने यह नहीं बताया की हमारा मंदिर और त्यौहार नहीं बंटा है , रामायण एक शूद्र (बाल्मीकि ) ने लिखा है और महाभारत वेदव्यास मुनि (मछुआरिन के बेटे ) | मनुस्मृति में तो कृषि करने वाले को भी शूद्र कहा गया है। शूद्र का मतलब घृणित वर्ग नहीं होता। कभी किसी कलम के सिपाही ने यह क्यों नहीं कहा की छोडो हज़ारो साल पुराने किताब को आओ आने वाला कल सवाँरे।
यह कलम की ताकत ही है की आज बॉलीवुड एक पत्रकार से डर गया | जो हिन्दू समाज हमेशा जान बचा कर भागते रहे कभी पाकिस्तान से ,कभी बांग्लादेश से तो कभी कश्मीर से , उस समाज पर सेक्रेड गेम्स , लीला , घौल जैसी मूवी कैसे बना दी ? 'भाग मिल्खा भाग ' नहीं बल्कि मूवी का नाम होना चाहिए था 'भाग हिन्दू भाग '| मुझे पता है ऐसा कहने पर मुझे पागल या नफ़रत करने वाली कहा जायेगा। क्षमा करें हमारा संस्कार नफरत करना नहीं सिखाता बस मेरी कलम सच लिखने को कहती है | मुझे पता है की मैंने हिन्दू माता पिता से जन्म लिया है इसलिए मैं हिन्दू हूँ। ठीक वैसे ही मुस्लिम लोग भी अपनी मर्जी से नहीं मुस्लिम हैं। परिवरिश ने हमें अपने धर्मों को पालन करना सिखाया है। मेरी औकात नहीं है पुरे मुस्लिम समाज से नफरत करने का। मुझे फिक्र है अपने आने वाली भविष्य की , क्यूंकि अच्छे मुसलमान तो औरंगजेब के समय भी थे , भारत के बंटवारे के समय भी थे और कश्मीर में भी थे लेकिन उनके अच्छाई हिन्दुओं के काम नहीं आई। मुझे दिकत उन मुसलमानों से है जो हिन्दुओं को काफिर कहते हैं और गजवा हिन्द का ख्वाब देखते हैं। ऐसे लोग अबतक सफल होते आये हैं इसलिए मुझे उनसे डर लगता है। मैं अपनी कलम से आगाह करने आई हूँ। कट्टरपंथ नहीं होना चाहिए। मुझे दिक्कत उन इतिहासकारों से है जिन्होंने गलत इतिहास लिखा , हिन्दुओं को निचा दिखाया। मुझे दिक्कत उन नेताओं से है जो कट्टरपंथ को बढ़ावा देते हैं और पक्षपात करके द्वेष फैलाते हैं। मुझे दिक्कत उन कलाकारों से है जो हिन्दू देवी देवता का मजाक बनाते हैं। बहुत से हिन्दू भक्ति नहीं करते लेकिन हमारे बड़े बुजुर्ग जो आस्था रखते हैं हम उनका अपमान समझते हैं। मैं अपनी कलम से मुस्लिम समाज की बहुत कमियां निकाल सकती हूँ लेकिन यह हमारा संस्कार नहीं है। आज मैंने जो भी लिखा है ,गौर करियेगा की मेरा हर पोस्ट इसी सोच के इर्द गिर्द रहता है।
जय भारत